सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति, यहां तक कि बच्चों का भी मौलिक अधिकार है। बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और उनकी आजादी, दोनों का ध्यान रखना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा- इंटरनेट पर गलत कंटेंट होने के कारण बच्चों के लिए इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाना सही नहीं है। ऐसी रोक से बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं। ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से भी डर सकते हैं।

कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट (CSEAM) को पहचानने और हटाने की व्यवस्था मजबूत करने के लिए केंद्र को नेशनल डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। सोशल मीडिया कंपनियों को भी ऐसा कंटेंट हटाने के दो घंटे के भीतर पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को रिपोर्ट देनी होगी।

5 साल में बच्चों की अश्लील सामग्री से जुड़े मामले 26.6 गुना बढ़े

गृह मंत्रालय की ओर से 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में पेश NCRB के आंकड़ों के मुताबिक, बच्चों की अश्लील तस्वीरों और वीडियो से जुड़े मामले 2018 में 44 थे, जो 2022 में बढ़कर 1,171 हो गए।

यानी 26.6 गुना बढ़े। वहीं, बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराध के मामले 2018 में 232 थे, जो 2022 में बढ़कर 1,823 हो गए। हालांकि, केंद्र ने 2022 के बाद का डेटा रिलीज नहीं किया।

डेटाबेस में कंटेंट की जांच के लिए होंगे ये इंतजाम

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने डेटाबेस में दर्ज सामग्री की सही पहचान करने के लिए कई निर्देश दिए हैं।

  • फोटो-वीडियो की डिजिटल पहचान होगी दर्ज: डेटाबेस में कंटेंट का डिजिटल हैश और उस वेबसाइट का लिंक रखा जाएगा, जहां वह मौजूद है।

  • तीन विशेषज्ञ करेंगे जांच: सामग्री को डेटाबेस में जोड़ने से पहले कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से जांचेंगे कि वह बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी है या नहीं। शुरुआती जांच में सॉफ्टवेयर की मदद ली जा सकती है।

  • दोबारा अपलोड होने पर भी पहचान होगी: सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट का डेटाबेस से मिलान कर सकेंगी। इससे वही सामग्री दूसरे प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड होने पर भी पहचानी जा सकेगी।

  • गलत जानकारी हटाने का इंतजाम: जांच का रिकॉर्ड रखा जाएगा और डेटाबेस तक किसने पहुंच बनाई, इसकी जानकारी दर्ज होगी। समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट होगा और गलत तरीके से दर्ज सामग्री को हटाने और उसकी शिकायत करने की व्यवस्था बनाई जाएगी।


स्कूली पढ़ाई में शामिल होगी ऑनलाइन सुरक्षा

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ तकनीकी इंतजाम बच्चों को इंटरनेट पर सुरक्षित रखने के लिए काफी नहीं हैं। बच्चों को ऑनलाइन खतरों को पहचानना, अपनी निजी जानकारी सुरक्षित रखना और गलत व्यवहार होने पर मदद मांगना भी सिखाना जरूरी है।

बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से सहमति, स्वस्थ रिश्तों, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, ऑनलाइन शोषण और उसकी शिकायत करने के तरीकों के बारे में बताया जाना चाहिए।

कोर्ट ने नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) और राज्य की शैक्षिक संस्थाओं से कहा कि वे बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की मदद से पढ़ाई की सामग्री तैयार करें।


पेड और सब्सक्रिप्शन वाली सेवाओं की भी जांच होगी

कोर्ट ने पेड और सब्सक्रिप्शन वाली वेबसाइटों और सेवाओं की सख्ती से जांच करने को कहा है। यह सुनिश्चित करना होगा कि इनके जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा या अन्य प्रतिबंधित कंटेंट न दिखाया जाए और न फैलाया जाए।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी विचार करने को कहा है कि ऐसी सामग्री से कमाई गई रकम जब्त करके वापस ली जा सकती है या नहीं।

केंद्र सरकार को 10 दिसंबर तक देनी होगी रिपोर्ट

केंद्र सरकार को कोर्ट के निर्देश लागू करने के लिए जरूरी नियम और काम करने का तरीका तय करना होगा। जरूरत पड़ने पर आईटी कानून और नियमों में बदलाव भी करने होंगे।

सरकार को हलफनामा देकर बताना होगा कि निर्देशों पर अब तक क्या काम हुआ है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।


क्या है CSEAM और मामले पर सुनवाई क्यों हुई

CSEAM यानी चाइल्ड सेक्शुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड अब्यूज मटेरियल। इसका मतलब बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री है। इसमें ऐसी तस्वीरें, वीडियो या अन्य डिजिटल कंटेंट शामिल होते हैं, जिनमें बच्चों का यौन शोषण दिखाया गया हो या जिन्हें इस तरह के शोषण के लिए इस्तेमाल किया जाता हो।

सुप्रीम कोर्ट में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरिश मामले में याचिका दायर कर सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसकी जानकारी भारतीय पुलिस को देने में कथित लापरवाही का मुद्दा उठाया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कंपनियां ऐसी सामग्री की जानकारी अमेरिका की संस्था को तो देती हैं, लेकिन भारतीय कानून के तहत पुलिस को रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी पूरी नहीं करतीं।


गूगल ने भारत से जुड़ी ऑनलाइन बाल यौन शोषण मामलों की जानकारी सीधे भारतीय एजेंसियों को देने पर सहमति जताई है। अब ऐसे मामलों की सूचना पहले अमेरिका की संस्था नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन को भेजने की जरूरत नहीं होगी। इससे भारतीय पुलिस को खतरे में फंसे बच्चों तक जल्दी पहुंचने में मदद मिल सकती है।