‘बीजेपी में कंफर्टेबल हैं या नहीं?’ जब यह सवाल ढाई साल पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए पूर्व मंत्री दीपक सक्सेना से पूछा गया, तो उनका जवाब था, ‘मैं संतुष्ट हूं।’

वहीं, बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में गए पूर्व मंत्री दीपक जोशी इसी सवाल पर दर्द बयां करते हैं, ‘मैं तो अब किसी भी पार्टी में नहीं हूं। न कांग्रेस मुझे बैठकों में बुलाती है और न ही बीजेपी मुझे अपना मानती है। मैं तटस्थ होकर ही खुश हूं।’

मध्य प्रदेश में 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और कांग्रेस के कई दिग्गजों ने पाला बदला था।

अब जब कांग्रेस ने 'घर वापसी' अभियान शुरू किया है और बीजेपी में गए 600 से ज्यादा नेताओं की वापसी के आवेदन का दावा किया है, तब पाला बदलने वाली यह सियासत फिर चर्चा में है।

30 साल बीजेपी में रहे, अब बोले- मैं तटस्थ हूं

भोपाल के 74 बंगले इलाके में स्थित पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बंगले पर कभी बीजेपी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा रहता था, लेकिन आज वहां सन्नाटा पसरा है। उनके बेटे और पूर्व मंत्री दीपक जोशी तीन दशक तक बीजेपी में रहने के बाद मई 2023 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

पार्टी क्यों छोड़ी?

पिता कैलाश जोशी के स्मारक के लिए बीजेपी सरकार की तरफ से जमीन न देना और कोरोना काल में पत्नी के निधन के दौरान इलाज में सरकारी मदद न मिलना। इसके उलट, कमलनाथ ने स्मारक के लिए जमीन आवंटित की थी।

कांग्रेस और बीजेपी में अब क्या है स्थिति?

कांग्रेस ने उन्हें खातेगांव से टिकट दिया, लेकिन वे चुनाव हार गए। जोशी कहते हैं कि हार के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक कांग्रेस ने बैठकों में बुलाया, फिर पूछना बंद कर दिया।

इस बीच शिवराज सिंह चौहान ने अनौपचारिक रूप से उनकी बीजेपी में वापसी का ऐलान किया, लेकिन तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने पार्टी नियमों का हवाला देकर रोक लगा दी। नतीजा ये हुआ कि दीपक जोशी आज न तो बीजेपी में है और न ही कांग्रेस में।


कमलनाथ का 48 साल पुराना साथ छूटा, अब बेटे के कारण बीजेपी में


छिंदवाड़ा में साल 1980 से कमलनाथ के सबसे करीबी और भरोसेमंद सिपहसालार रहे दीपक सक्सेना को कभी छिंदवाड़ा का 'कमलनाथ' कहा जाता था।

दिग्विजय सरकार में मंत्री रहे सक्सेना 7 बार विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं। छिंदवाड़ा में रोहना स्थित उनके बंगले पर त्योहारों पर मेले जैसा माहौल रहता था।

पार्टी क्यों छोड़ी?

2018 में नकुलनाथ के आने के बाद उपेक्षा का एहसास और बेटे अजय सक्सेना का बीजेपी में शामिल होना। पिता-पुत्र के अलग-अलग दलों में रहने की स्थिति से बचने के लिए उन्होंने 48 साल पुराना साथ तोड़ दिया।

21 मार्च 2024 को उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और 5 अप्रैल 2024 को बीजेपी में शामिल हो गए।

बीजेपी में अब क्या है स्थिति?

दीपक सक्सेना को निगम-मंडल में पद मिलने की चर्चाएं थीं, लेकिन लंबे समय बाद भी उन्हें संगठन या सरकार में कोई पद नहीं मिला है, हालांकि उनका बेटा अजय सक्सेना बीजेपी का जिला उपाध्यक्ष है।

जो दीपक सक्सेना कभी अपने रोहना बंगले पर नेताओं का दरबार लगाते थे, वे पिछली दिवाली पर बीजेपी नेताओं के घर मिठाई के डिब्बे लेकर पहुंचे।


200 करोड़ संपत्ति, 140 करोड़ की रिकवरी का डर और बीजेपी में एंट्री


इंदौर-1 से पूर्व कांग्रेस विधायक संजय शुक्ला मार्च 2024 में बीजेपी में आए थे। 200 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वाले शुक्ला कांग्रेस के बड़े आर्थिक मददगार माने जाते थे।

पार्टी क्यों छोड़ी?

राम मंदिर का न्योता ठुकराने का विरोध और कैलाश विजयवर्गीय से चुनाव हारने के बाद कांग्रेस में भविष्य न दिखना, लेकिन अंदरूनी कहानी यह थी कि सीएम बदलने के बाद उन पर पुराने अवैध खनन केस में 140 करोड़ रुपए (उनकी कुल संपत्ति का करीब 65%) की रिकवरी की फाइल खुलने का अनौपचारिक मैसेज पहुंच गया था।

अब क्या है स्थिति?

बीजेपी में उनके पास फिलहाल कोई पद नहीं है और न ही टिकट का कोई आश्वासन है।


50 साल का नाता तोड़ा, पर बीजेपी में अब तक नहीं मिला कोई बड़ा पद


4 बार राज्यसभा सांसद, 2 बार केंद्रीय मंत्री, यूथ कांग्रेस और एमपी कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे सुरेश पचौरी ने 9 मार्च 2024 को 50 साल पुराना कांग्रेस से अपना रिश्ता तोड़ दिया।

पचौरी के नेतृत्व में 2008 में कांग्रेस ने 78 विधानसभा सीटें और 2009 में 12 लोकसभा सीटें जीती थीं।

पार्टी क्यों छोड़ी?

अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को कांग्रेस की तरफ से ठुकराए जाने और पार्टी में बढ़ती जातीय राजनीति से आहत होकर। पचौरी के मुताबिक, पूर्व पीएम राजीव गांधी के समय से ही वे राम मंदिर शिलान्यास के पक्षधर रहे थे।

अब क्या है स्थिति?

बीजेपी में शामिल होने के दो साल बाद पचौरी किसी राज्य स्तरीय पद पर नहीं हैं। पिछले महीने ही उन्हें बीजेपी की 'भोपाल जिला कार्यकारिणी' में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। हालांकि, ऑफ द रिकॉर्ड पचौरी का कहना है कि वे अपनी वर्तमान भूमिका से पूरी तरह संतुष्ट हैं।


एक्सपर्ट व्यू: 'उपयोगिता खत्म, अब वजूद साबित करना बड़ी चुनौती'

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता का कहना है कि चुनाव के समय बीजेपी ने विपक्ष पर रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए कांग्रेस नेताओं को अपने साथ लिया था। चुनाव जीतने तक उनका इस्तेमाल हुआ।

अब दोनों ही पार्टियों में इन नेताओं की प्रासंगिकता पर सवाल हैं। बीजेपी एक कैडर-बेस्ड पार्टी है, जहां अपनी मर्जी से मुद्दे उठाना आसान नहीं होता।

वहीं अगर ये नेता अपनी मूल पार्टी (कांग्रेस) में वापस भी जाना चाहें, तो वहां के स्थानीय समीकरण और बड़े नेता इनकी आसानी से वापसी नहीं होने देंगे।