नमस्कार,
झालावाड़ में सरपंच का चुनाव लड़ने की इच्छुक महिला वक्त पर पर्चा भरना भूल गई। चूरू में राठौड़ साहब की पुत्रवधु ने ‘सलाम वालेकुल’ कहकर इस्तकबाल किया। सांसद उम्मेदाराम की मीटिंग में गिनती के लोग पहुंचे और अलवर में टपकती छत के नीचे वोटिंग हो गई।
राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में…
1. पर्चा भरना ही भूल गई
हसन कमाल साहब ने एक यादगार गीत लिखा- दिल के अरमां आंसुओं में बह गए।
झालावाड़ की मनभर देवी के साथ भी यही हुआ। सूमर ग्राम पंचायत में वे सरपंच बनकर दाखिल होना चाहती थीं।
जोरदार प्रचार किया। परिवार के लोग-लुगाई सब प्रचार में जुट गए। सास-जेठानियों-देवरानियों ने महिला वोटरों का मोर्चा संभाला।
पतिदेव बच्चों को गोद में टांगकर गली-गली घूमे। खूब माहौल बनाया। माहौल बन भी रहा था। प्रशासन ने ऐलान किया कि फलां तारीख को सुबह 11 बजे तक सरपंच का पर्चा भर दो।
उम्मीदवार ने समझा कि सुबह 11 बजे से पर्चा भरना है। वे धुआंधार प्रचार में जुटी रहीं और घड़ी में 11 बजने का इंतजार करती रहीं। 11 बजते ही उनके अरमानों के बारह बज गए।
पर्चा भरने पहुंचीं तो पता चला कि वक्त खत्म हो चुका है। अब 5 साल बाद ट्राई करना। यह सुन पूरे परिवार के पगों तले जमीन खिसक गई।
जोनल मजिस्ट्रेट काम खत्म कर कार में बैठकर निकलने लगे तो परिवार गाड़ी के सामने आ गया। उम्मीदवार, पति, समर्थक सब के सब हाथ जोड़ बोनट पर लद गए।
कहने लगे कि बाबूजी इनका पर्चा भरवा दो। लेकिन नियम तो नियम हैं। एक बार तीर कमान से छूट गया तो छूट गया। बाबूजी का दिल पसीज भी जाता तो क्या हो जाता। हां, कोई तगड़ी सिफारिश होती तो शायद चांस था।
बाबूजी ने गर्दन हिलाकर असहमति जता दी और रास्ता खाली करने को कहा। इतना सुनकर उम्मीदवार की सास पछाड़ मारकर सड़क पर लोट गई। चीख पुकार मच गई। पतिदेव दहाड़े मारने लगा।
आखिरकार पुलिस की मदद से ड्रामे का परदा गिरा।
2. राठौड़ की पुत्रवधु का 'सलाम वालेकुम'
राजेंद्र राठौड़ साहब ने राजस्थान में लंबी और नॉट आउट राजनीतिक पारी खेली। लेकिन उन्हें वह मुकाम अब तक नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद करते होंगे।
कसक कहीं न कहीं मन में छुपी तो होगी। मंच से व्यथा कई बार इशारों में बयान भी कर चुके। राजू भैया से बाबो सा तक का सफर तय कर चुके हैं।
अब नई खेप की बारी है। चूरू जिला परिषद के चुनाव में उन्हें पार्टी ने वार्ड 39 से मैदान में उतारा। वे जिला भाजपा के उपाध्यक्ष बने।
इससे पहले उन्हें चूरू जिला क्रिकेट संघ का अध्यक्ष भी बनाया गया था।
राठौड़ साहब की पुत्रवधु और पराक्रम राठौड़ की पत्नी कनिका सिंह भी जिला परिषद के वार्ड नंबर 23 से चुनावी मैदान में उतरीं।
राजनीति की पाठशाला घर में ही हो तो लोगों का इस्तकबाल खूब मिलता है। मुस्लिम बहुल पीथीसर गांव में उनकी सभा थी। काफी संख्या में लोग कनिका सिंह को सुनने आए थे। उन्होंने बात अपने ससुरजी से शुरू की।
बताया कि ससुर साहब होली-दीपावली और ईद के त्योहार आप लोगों के बीच चूरू में मनाते रहे। इस कारण परिवार के लिए वे त्योहार पर घर पर उपलब्ध नहीं होते थे।
भाषण खत्म कर कनिका ने सभी को प्रणाम किया तो भीड़ से आवाज आई- सलाम वालेकुम। कनिका ने हंसते हुए बात दोहराई- ठीक है, सलाम वालेकुम। भीड़ से आवाज आई-वालेकुम सलाम। इसके बाद तालियां गूंजने लगीं।
3. सांसदजी की सभा में भीड़ नहीं
बाड़मेर-जैसलमेर सांसद महोदय दिल्ली में गिरफ्तारी देकर छा गए थे। सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हुई। दिल्ली पुलिस ने हाथ-पैरों से उठाकर गाड़ी में डाल दिया था।
अब आलाकमान ने ‘चलो दिल्ली’ का आह्वान किया है। नेताओं को टारगेट दिए हैं। प्रदेशभर के नेता बड़े बडे़ दावे कर रहे हैं कि हमारे जिले से 10 हजार की भीड़ दिल्ली पहुंचेगी।
लेकिन अब सांसद जी के माथे पर चिंता की लकीरें दिख रही हैं। चिंता का कारण भीड़ की भारी कमी है। पंचायत चुनाव के दौरान वे बालोतरा के भीमथल गांव में गए थे। साथ में बायतु विधायक हरीश चौधरी भी थे।
जाजम पर मीटिंग होनी थी। मंच लगाया गया था। दरियां फैलाई गई थीं। मंच पर पैर लटकाकर सांसद और विधायक बैठे थे। लेकिन सभा में गिनती के बीस-चालीस लोग पहुंचे।
स्थानीय संगठन भीड़ जुटाने में नाकाम। दोनों नेता काफी नाराज हुए। वीडियो सोशल मीडिया पर आया तो खिल्ली उड़ने लगी।
मीटिंग के बाद सांसद महोदय ने विश्वस्त चार-पांच कार्यकर्ताओं को कोने में इकट्ठा किया और दबे स्वर में बोले- अगर ये हाल था तो पहले ही कह देते। मीटिंग कैंसिल कर देते। कभी और किसी दिन कर लेते।
दबे स्वर में कही गई बात का भी किसी विश्वस्त समर्थक ने वीडियो बना लिया। यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर आ गया।
लोग कमेंट कर रहे हैं कि गुढ़ामालानी इलाके में कांग्रेस का झंडा उठाने वाले नहीं मिल रहे। जब तक हेमारामजी थे, उन्होंने किसी और को यहां पनपने ही नहीं दिया।
किसी यूजर ने सांसदजी का इतिहास खंगाला। लिखा- ये जब तक आरएलपी में थे, तब तक लोग इनके साथ थे।
4. चलते-चलते...
करीब 50 साल पहले कवि दुष्यंत कुमार के चर्चित गजह संग्रह ‘साये में धूप’ प्रकाशित हुआ। संग्रह में एक गजल काफी प्रसिद्ध हुई। गजल का एक अंश इस प्रकार था-
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
सूरत है कि बदलती ही नहीं है। इन पंक्तियों को लिखे 50 साल से ज्यादा का वक्त हो गया है, उस समय की व्यवस्था पर चोट करते इन शब्दों की धार आज भी कायम है क्योंकि व्यवस्था में खास सुधार होता नहीं दिख रहा। बल्कि राजनीति में दाग-पर-दाग लगे जाते हैं।
पंचायत चुनाव में कोटा-सीकर समेत कई जगहों से ऐसी तस्वीरें आईं जिनमें बुजुर्ग लोग पैदल, लाठी के सहारे, पोते-पोतियों का हाथ पकड़कर, व्हील चेयर पर, गोद में, पीठ पर किसी भी भांति मतदान बूथ तक पहुंचे और वोट दिया।
इतने कष्ट पाकर वोट क्यों दिया? ताकि सूरत बदले। लेकिन सूरत नहीं बदलती।
अलवर के राजगढ़ में वोटिंग के दौरान बारिश होती रही। गोलाकाबास गांव में मतदान केंद्र के बूथ संख्या 20 में छत से पानी टपकता रहा।
वोटिंग रूम में पानी भर गया। फिर भी यहां कतारें लगी रहीं। छत ऐसी कि किसी भी वक्त लरज कर गिर पड़े। फिर भी मतदान होता रहा।
एक मतदाता ने कह ही दिया- ऐसी जर्जर जगह पर वोटिंग करा रहे हैं। डर लग रहा है कि कोई हादसा न हो जाए।
हालात ऐसे हैं कि अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले जमानती मुचलकों पर घूम रहे हैं। चुप रहने में हर कोई भलाई समझता है। वोटर आंख, कान, मुंह बंद कर ठप्पा लगाए जाती है।
हर बार सत्ता बदलती है लेकिन सूरत नहीं बदलती।
जिस पीर को दुष्यंत कुमार ने पर्वत सी कहा था और पिघलने की कामना की थी, उस कामना की आधी सदी बाद हिमालय के ग्लेशियर पिघलने लगे हैं, लेकिन पीर ज्यों की त्यों है।
इनपुट सहयोग- साजिद शेख (अलवर), नरेश भाटी (चूरू), स्वप्निल सक्सेना (सीकर)।