रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव में इस बार पारंपरिक वनौषधि चिकित्सा से जुड़े वैद्यराज संतोष पटेल और उनके सहयोगी तीजूराम साहू को अब तक आमंत्रण नहीं मिलने का मामला सामने आया है। दोनों वैद्य ग्राम मल्हारी के निवासी हैं और नेत्र संबंधी समस्याओं के पारंपरिक उपचार के लिए जाने जाते हैं। सूत्रों के अनुसार वन औषधि पादप बोर्ड की ओर से इस वर्ष उन्हें नजरअंदाज किया गया है, जबकि वैद्यों का कहना है कि पूर्व के वर्षों में वन विभाग की ओर से उन्हें स्टॉल और आमंत्रण मिलता रहा है।
वनौषधियों के पारंपरिक ज्ञान से जुड़ा है काम
छत्तीसगढ़ के वनांचलों में पारंपरिक वैद्य लंबे समय से स्थानीय वनस्पतियों के आधार पर विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार की पद्धतियों का इस्तेमाल करते रहे हैं। संतोष पटेल और तीजूराम साहू भी इसी पारंपरिक ज्ञान के आधार पर नेत्र संबंधी समस्याओं का उपचार करते हैं।
उनके मुताबिक, वे स्थानीय वनस्पति 'नेत्र ज्योति' के बीजों का इस्तेमाल करते हैं। वनस्पति शास्त्र में इसे Hygrophila polysperma कहा जाता है। वैद्यराज पटेल ने बताया कि आंखों में इस्तेमाल के लिए वे गुलबकावली के फूलों से आसवन प्रक्रिया के जरिए अर्क तैयार करते हैं। इसमें तेंदू का गोंद मिलाया जाता है।
'गुलबकावली तेंदू लासा अर्क' तैयार करने की विधि
संतोष पटेल के अनुसार, गुलबकावली के फूलों को उबालकर उनका वाष्पीकरण और आसवन किया जाता है। इससे प्राप्त अर्क को शीशियों में भरकर उसमें तेंदू के गोंद के बारीक कण मिलाए जाते हैं। उनके मुताबिक, अर्क भरने से पहले शीशियों को गर्म पानी में उबालकर साफ किया जाता है। इस मिश्रण को वे 'गुलबकावली तेंदू लासा अर्क' कहते हैं।
पुराने मामलों के लिए तैयार करते हैं 'काला अर्क'
वैद्यराज पटेल ने बताया कि पुराने मामलों के लिए वे 'काला अर्क' नामक एक अन्य मिश्रण तैयार करते हैं। इसमें गाय का ताजा दूध, काला भृंगराज, तिल्ली का तेल, पुनर्नवा, मुलेठी और पथरी भाजी जैसी सामग्री शामिल होती है।
उनके बताए तरीके के अनुसार, इन सामग्रियों को धीमी आंच पर दो-तीन दिनों तक पकाया जाता है। लगातार पकाने के बाद जब केवल तेल शेष रह जाता है, तब काला अर्क तैयार होता है। पटेल के मुताबिक, आंखों का जाला साफ करने के लिए मरीज की स्थिति के अनुसार करीब एक महीने के अंतराल पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है।
कई राज्यों में लगा चुके हैं शिविर
संतोष पटेल और तीजूराम साहू के मुताबिक, वे छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली सहित कई राज्यों में शिविर लगा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई, सूरजपुर, अंबिकापुर और बस्तर जैसे क्षेत्रों में भी शिविर आयोजित करने की बात उन्होंने बताई।
उनका कहना है कि रायपुर के गुलमोहर पार्क में भी नियमित रूप से शिविर लगाया जाता है। उन्होंने बताया कि उनके शिविरों में रायपुर के गर्ल्स कॉलेज के शिक्षकों और छात्राओं के अलावा विज्ञान विषय के प्रोफेसरों तथा अन्य कर्मचारियों ने भी उपचार कराया है।
राज्योत्सव में स्टॉल और आमंत्रण की मांग
वैद्यराज संतोष पटेल ने बताया कि पूर्व के वर्षों में वन विभाग की ओर से उन्हें राज्योत्सव में स्टॉल दिया जाता था और आमंत्रित किया जाता था। इस बार अब तक आमंत्रण नहीं मिलने से वे निराश हैं। उनका कहना है कि यदि राज्य सरकार या वन औषधि पादप बोर्ड उन्हें बुलाता है, तो वे अपनी टीम के साथ राज्योत्सव में शामिल होने के लिए तैयार हैं।
पटेल ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के परिवार, स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों के उपचार के लिए अपने यहां जाने की बात भी कही। उन्होंने बताया कि रायपुर के गर्ल्स कॉलेज की वनस्पति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. नीतू हरमुख सहित कई लोगों ने उपचार से लाभ मिलने का अनुभव साझा किया है।
वनौषधियों के ज्ञान को मंच देने की अपेक्षा
वैद्यराज संतोष पटेल और तीजूराम साहू का कहना है कि वे अपने पारंपरिक वनौषधि ज्ञान को राज्योत्सव के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। उनका मानना है कि छत्तीसगढ़ के वनांचलों में मौजूद पारंपरिक ज्ञान को पहचान और मंच मिलना चाहिए। अब वे राज्य सरकार और वन औषधि पादप बोर्ड की ओर से आमंत्रण मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वन औषधि पादप बोर्ड ने पारंपरिक वैद्यों को किया नजरअंदाज, राज्योत्सव में आमंत्रण का इंतजार
रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव में इस बार पारंपरिक वनौषधि चिकित्सा से जुड़े वैद्यराज संतोष पटेल और उनके सहयोगी तीजूराम साहू को अब तक आमंत्रण नहीं मिलने का मामला सामने आया है। दोनों वैद्य ग्राम मल्हारी के निवासी हैं और नेत्र संबंधी समस्याओं के पारंपरिक उपचार